Thursday, November 24, 2011

Kalsarp Dosh Shanti

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 कालसर्प योग: (Kalsarpdosh Shanti Pujan)
यह माना जाता है की राहू-केतु के मध्य में समस्त ग्रह आजाने के कारण छाया ग्रहों के कारण अन्य ग्रह प्रभाव हीन हो जाते है, अत: व्यक्ति को जीवन में विशेष परिश्रम करना  पड़ता  है; अत: कालसर्प योग का निमार्ण का मुख्य कारण राहू- केतु होते हे, क्योंकि राहू "काल" के अधिदेवता है एवं केतु "सर्प" के अधिदेवता है. इसलिए इस योग को कालसर्प योग कहा जाता है. यह कालसर्प योग बुरा योग नहीं होता है, कालसर्प योग वाला जातक को जीवन में इसका शुभफल इसकी शांति पूजन करने के बाद अवश्य प्राप्त होता है. 
कुल १२ भाव के आधार पर १२ तरह  क कालसर्पयोग माने गए है, अलग अलग राशी में इनके  फल में कुछ परिवर्तन हो जाता है अत: १२*१२=१४४ प्रकार के कालसर्पयोग बनते है, इसमें राहू केतु क मध्य इनका फल अलग अलग होता हे अत: कुल १४४*२=२८८ प्रकार के कालसर्पयोग माने  गए है,


!! नागस्त्रोत्र !!
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम ! 
शंखपालं धात्रराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा!!
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम!
सायंकाले पठेनित्यं प्रात:काले विशेषतः !!
तस्मै विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्!!

१२ भाव के आधार पर १२ कालसर्पयोग इस प्रकार है-
१. अन्नत कालसर्पयोग   ७. तक्षक कालसर्पयोग
जब राहू लग्न में व केतु सप्तम भाव में हो!
फलित :- मानसिक रूप से अशांत, अदालती केसों का सामना, विवाहित जीवन में सुख की कमी, जीवन में सम्मान पाने में संघर्ष
जब राहू सप्तम में व केतु लग्न भाव में हो!
फलित :- विवाह में मतभेद, पारिवारिक कलह, जीवन में संघर्ष
२. कुलिक कालसर्पयोग ८. कर्कोटक कालसर्पयोग
जब राहू द्वितीय में व केतु अष्टम  भाव में हो!
फलित :- अस्वस्थ, आर्थिक स्थिति ख़राब, आय से अधिक व्यय, पारिवारिक तनाव, पत्नी से विरोध,
जब राहू अष्टम में व केतु द्वितीय भाव में हो!
फलित :- भाग्य में उन्नति नहीं, पैत्रक सम्पति में भाग नहीं, दीर्घकालीन रोग, अपार हानी
३. वासुकी कालसर्पयोग ९ . शंखचुड कालसर्पयोग
जब राहू तृतीय  में व केतु नवम  भाव में हो!
फलित :- सहोदर भाई बहनों से कष्ट, वाहन से पीड़ा, पूर्ण जीवन उतर चड़ाव,
जब राहू नवम में व केतु तृतीय भाव में हो!
फलित :- पिता का सुख कम, शासन से दण्डित, जीवन में सुख प्राप्ति के लिए संघर्ष,
४. शंखपाल  कालसर्पयोग १०. घातक कालसर्पयोग
जब राहू चतुर्थ  में व केतु दशम भाव में हो!
फलित :- शिक्षा में कठिनाई, जीवन में कई उलट फेर, आर्थिक कठिनाईया, वाहन से पीड़ा
जब राहू दशम में व केतु चतुर्थ भाव में हो!
फलित :-व्यापार में कठिनाईया, सफलता के करीब होने पर बाधा, संतान रुग्ण
. पद्म कालसर्पयोग ११. विषाक्त कालसर्पयोग
जब राहू पंचम में व केतु एकादश भाव में हो!
फलित :-संतान से दुखी, वृदावस्था में संतान सुख नहीं, शत्रुभय, शारीरिक कष्ट, मित्रो से धोखा
जब राहू एकादश में व केतु पंचम भाव में हो!
फलित :-जन्मभूमि से दूर गमन, बड़े भाई से मतभेद, नेत्र रोग, अनिद्रा
६. महापद्म कालसर्पयोग १२. शेषनाग कालसर्पयोग
जब राहू षष्टम में व केतु द्वादश भाव में हो!
फलित :- शत्रु से पीड़ा, प्रणय सम्बन्ध विफल, प्रियजन व पत्नी से अलगाव
जब राहू द्वादश में व केतु षष्टम भाव में हो!
फलित :-गुप्त शत्रु भय, झगड़ो में उलझाना, जीवन में बदनामी,
"कालसर्प दोष निवारण पूजन" यजुर्वेद के मंत्रो द्वारा वैदिक रीती से उज्जैन में स्थित सिध्वट तीर्थ पर " श्रीगौड़ शुक्ल अवंतिका तीर्थ पुरोहित"  पंडित कृष्णेश शुक्ल, पंडित विवेक शुक्ल द्वारा संपन करायी जाती है, इसके कुछ चित्र नीचे प्रदर्शित है,  कालसर्पयोग शांति पूजन के लिए आप मोबाइल के माध्यम से निशुल्क परामर्श कर सकते है,









काल सर्प योग से सम्बन्धित कथा

पौराणिक कथा के अनुसार सिंघिका नामक राक्षस का पुत्र स्वरभानु था जो बहुत ही शक्तिशाली था। स्वरभानु ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने स्वरभानु को वरदान दिया जिससे उसे ग्रह मंडल में स्थान प्राप्त हुआ। स्वरभानु किस प्रकार राहु केतु के नाम से जाना गया इसकी कथा सागर मंथन से जुड़ा है। सागर मंथन के समय देवताओं और दानवों में एक समझौता हुआ जिसके तहत दोनों ने मिलकर सागर मंथन किया। इस मंथन के दौरान सबसे अंत में भगवान धनवन्तरी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत पाने के लिए देवताओं और दानवों में संघर्ष की स्थिति पैदा होने लगी। भगवान विष्णु तब मोहिनी रूप धारण करके उनके बीच प्रकट हुए और देवताओं व दानवों को अलग अलग पंक्तियों में बैठाकर अमृत बांटने लगे। अपनी चतुराई से मोहिनी रूप धारण किये हुए भगवान विष्णु केवल देवताओं को अमृत पिला रहे थे जिसे दानव समझ नहीं पा रहे थे परंतु स्वरभानु मोहिनी की चतुराई का समझकर देवताओं की टोली में जा बैठा।
अमृत वितरण के क्रम में मोहिनी ने स्वरभानु को देवता समझकर उसे भी अमृत पान करा दिया परंतु सूर्य और चन्द्रमा ने उसे पहचान लिया तब विष्णु ने सुदर्शन चक्र से स्वरभानु का सिर धड़ से अलग कर दिया। चुंकि अमृत स्वरभानु के जीभ और गर्दन को छू गया था अत: वह सिर कट जाने पर भी जीवित रहा। ब्रह्मा जी ने स्वरभानु से कहा कि तुम्हारा सिर राहु के नाम से जाना जाएगा और धड़ जो सांप की तरह है वह केतु के रूप में जाना जाएगा। इस घटना के बाद से ही स्वरभानु राहु केतु के रूप में विख्यात हुआ। सूर्य और चन्द्रमा के कारण ही उसे इस स्थिति से गुजरना पड़ा था इसलिए वह उसे अपना शत्रु मानने लगा। पौराणिक कथा के अनुसार राहु केतु सूर्य और चन्द्रमा को निगल लेता है जिससे सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होता है।

अन्य ग्रहों की अपेक्षा राहु और केतु में एक महत्वपूर्ण अन्तर यह है कि जहां अन्य ग्रह घड़ी की विपरीत दिशा में चलते हैं वहीं राहु केतु घड़ी की दिशा में भ्रमण करते हैं। राहु केतु में एक अन्य विशेषता यह है कि दोनों एक दूसरे से सातवें घर में स्थित रहते हैं. दोनों के बीच 180 डिग्री की दूरी बनी रहती है।

ऋग्वेद के अनुसार राहु केतु ग्रह नहीं हैं बल्कि असुर हैं। अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र दोनों आमने सामने होते हैं उस समय राहु अपना काम करता है जिससे सूर्य ग्रहण होता है। उसी प्रकार पूर्णिमा के दिन केतु अपना काम करता है और चन्द्रग्रहण लगता है। वैदिक परम्परा में विष्णु को सूर्य भी कहा गया है जो दीर्घवृत्त के समान हैं। राहु केतु दो सम्पात बिन्दु हैं जो इस दीर्घवृत्त को दो भागों में बांटते हैं। इन दो बिन्दुओं के बीच ग्रहों की उपस्थिति होने से कालसर्प योग बनता है जो व्यक्ति के पतन का कारक माना जाता है।